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राहुल द्रविड़ ने गौतम गंभीर की ‘सुपरस्टार कल्चर’ नीति पर उठाए सवाल

Priya Sharma · · 1 min read

भारतीय क्रिकेट में सुपरस्टार संस्कृति पर राहुल द्रविड़ की बेबाक राय

भारतीय क्रिकेट में पिछले कुछ समय से ‘सुपरस्टार कल्चर’ बनाम ‘टीम फर्स्ट’ नीति को लेकर बहस तेज हो गई है। हाल ही में, पूर्व भारतीय मुख्य कोच राहुल द्रविड़ ने इस मुद्दे पर अपनी स्पष्ट राय रखते हुए गौतम गंभीर की रणनीतियों से अलग दृष्टिकोण पेश किया है। द्रविड़ का मानना है कि किसी भी खेल के विकास के लिए नायकों का होना अनिवार्य है और सुपरस्टार खिलाड़ी ही अक्सर टीम की बड़ी सफलता के वाहक बनते हैं।

सुपरस्टार ही बनाते हैं टीम की सफलता की कहानी

विजडन के ‘द स्कूप’ पॉडकास्ट में बात करते हुए द्रविड़ ने कहा, ‘किसी भी खेल को नायकों की जरूरत होती है। आप मैदान पर प्रदर्शन किए बिना लोगों की कल्पनाओं को नहीं जीत सकते। विशेष रूप से भारत जैसे देश में, जहां आपको प्रशंसा के साथ-साथ कड़ी आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ता है। लगातार जांच और दबाव के बीच सुपरस्टार बनना यह साबित करता है कि खिलाड़ी ने कुछ बहुत बड़ा हासिल किया है और अपनी टीम को जिताने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।’

गंभीर के दौर में टेस्ट क्रिकेट की चुनौतियां

गौतम गंभीर के कार्यकाल में भारतीय टीम ने सीमित ओवरों के क्रिकेट में, जैसे कि 2025 चैंपियंस ट्रॉफी और 2026 टी20 विश्व कप में शानदार प्रदर्शन किया है। हालांकि, टेस्ट क्रिकेट में टीम का प्रदर्शन निराशाजनक रहा है। पिछले दो वर्षों में भारत को न्यूजीलैंड (2024) और दक्षिण अफ्रीका (2025) के खिलाफ घरेलू मैदानों पर क्लीन स्वीप का सामना करना पड़ा है। डब्ल्यूटीसी (WTC) फाइनल की दौड़ से बाहर होने के बाद, द्रविड़ की यह टिप्पणी अधिक प्रासंगिक हो जाती है।

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बदलाव का दौर और दिग्गजों की कमी

द्रविड़ ने स्वीकार किया कि रोहित शर्मा, विराट कोहली और आर अश्विन जैसे दिग्गजों के संन्यास के बाद टीम के लिए एक बड़ा शून्य पैदा हुआ है। उन्होंने कहा, ‘रेड-बॉल क्रिकेट में अच्छा करने का जुनून आज भी है, लेकिन बड़े खिलाड़ियों को बदलना आसान नहीं है। हमें यह समझना होगा कि यह बदलाव का दौर है और इसमें समय लगेगा।’

क्रिकेट का बढ़ता बोझ और खिलाड़ियों की समस्या

द्रविड़ ने वर्तमान खिलाड़ियों के संघर्ष पर बात करते हुए कहा कि आज की पीढ़ी और उनके समय में सबसे बड़ा अंतर क्रिकेट की मात्रा का है। उन्होंने कहा, ‘रेड-बॉल क्रिकेट आज भी महत्वपूर्ण है, लेकिन खिलाड़ियों को बहुत अधिक व्हाइट-बॉल क्रिकेट खेलना पड़ रहा है। कई प्रारूपों के बीच तालमेल बिठाना आसान नहीं है। हमारे समय में क्रिकेट का कैलेंडर इतना व्यस्त नहीं था, इसलिए हमें तैयारी के लिए पर्याप्त समय मिलता था, जो आज के खिलाड़ियों के लिए एक चुनौती बन गई है।’

निष्कर्ष: क्या रास्ता निकलेगा?

भले ही भारतीय टीम वर्तमान में टेस्ट क्रिकेट में संघर्ष कर रही है, लेकिन द्रविड़ का मानना है कि भारतीय क्रिकेट का ढांचा मजबूत है। उनकी राय में, सुपरस्टार खिलाड़ियों के महत्व को नजरअंदाज करने के बजाय, उन्हें टीम के साथ जोड़कर एक बेहतर संतुलन बनाना जरूरी है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या बीसीसीआई और टीम प्रबंधन आने वाले समय में द्रविड़ के इस सुझाव पर विचार करते हैं या फिर ‘नो-सुपरस्टार’ नीति ही जारी रहती है।

अंततः, भारतीय प्रशंसक केवल जीत देखना चाहते हैं, और राहुल द्रविड़ का यह मानना है कि प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ी ही अंततः टीम की पहचान और सफलता का पर्याय बनते हैं। यह बहस आने वाले दिनों में और तेज हो सकती है क्योंकि भारत को अपनी टेस्ट साख को फिर से स्थापित करने के लिए एक ठोस रणनीति की आवश्यकता है।

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Written by Priya Sharma

Priya Sharma is a senior cricket correspondent for The Indian Express, and one of the most respected voices covering women’s cricket in India. A graduate of Miranda House, she started her career in a newsroom dominated by men’s sport and deliberately chose to put women’s cricket at the centre of her reporting. Priya has chronicled the Indian women’s team through World Cups, the transformational arrival of the Women’s Premier League, and the quiet, determined rise of girls’ cricket in small towns and villages. Her long‑form profiles of cricketers like Smriti Mandhana, Jemimah Rodrigues, and Renuka Singh are known for their depth and sensitivity. Beyond match reports, Priya writes regularly on media representation and the structural barriers women face in sports journalism. A recipient of the Ramnath Goenka Award and the Laadli Media Award, she believes that telling the full story of women’s cricket is not just a beat, but a responsibility.